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भागीरथपुरा में मौतों के बाद भी सिस्टम नहीं जागा? नेता प्रतिपक्ष सिंघार ने रिपोर्ट के आधार पर सरकार को घेरा

जन प्रकाशन 3 अक्टूबर 2026
3 मिनट में पढ़ें
भागीरथपुरा में मौतों के बाद भी सिस्टम नहीं जागा? नेता प्रतिपक्ष सिंघार ने रिपोर्ट के आधार पर सरकार को घेरा

36 मौतों की जांच, 22 को दूषित पानी से संभावित संबंध; 66 दिन फाइल अटकी, पाइपलाइन बदलने में लगे 859 दिन

इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई त्रासदी के बाद अब न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट के आधार पर व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल उठने लगे हैं। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने शुक्रवार को रेसीडेंसी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में 36 मौतों की जांच का उल्लेख है, जिनमें 22 मौतों को दूषित पानी से संभावित रूप से जुड़ा माना गया है। सिंघार ने मांग की कि रिपोर्ट में सामने आई कमियों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जाए और प्रभावित परिवारों को राहत दी जाए।

सालों की अनदेखी बनी त्रासदी की पृष्ठभूमि

सिंघार ने कहा कि आयोग की रिपोर्ट से साफ है कि भागीरथपुरा की घटना को केवल एक दिन या एक तकनीकी खराबी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। पेयजल और सीवरेज व्यवस्था की योजना, रखरखाव और निगरानी में लंबे समय से चली आ रही कमियां सामने आई हैं। कई जगह सीवर और पेयजल लाइनें एक-दूसरे के बेहद करीब, समानांतर या क्रॉसिंग की स्थिति में मिलीं। सीवर में रिसाव और पानी की पाइपलाइन में निगेटिव प्रेशर से दूषित पानी के नेटवर्क में पहुंचने की संभावना भी सामने आई।

पाइपलाइन का रिकॉर्ड नहीं, फिर कैसे तलाशेंगे गड़बड़ी?

उन्होंने पानी और सीवरेज नेटवर्क के ब्लूप्रिंट, डिजाइन और अलाइनमेंट से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने पर भी सवाल उठाया। सिंघार ने कहा कि जब पाइपलाइन का पूरा रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं होगा तो लीकेज, क्रॉस कनेक्शन या दूषित पानी के स्रोत का पता लगाना भी मुश्किल होगा। उनके मुताबिक यह सिर्फ तकनीकी खामी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की निगरानी व्यवस्था पर सवाल है।

66 दिन फाइल रुकी, लेकिन सवाल अब भी कायम

सिंघार ने फाइल मूवमेंट का जिक्र करते हुए कहा कि संबंधित फाइल मेयर के हस्ताक्षर के लिए 66 दिन तक लंबित रही। उन्होंने स्पष्ट किया कि आयोग ने केवल फाइल लंबित रहने के आधार पर मेयर की व्यक्तिगत लापरवाही तय नहीं की है, लेकिन यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि जरूरी काम से जुड़ी फाइल इतने लंबे समय तक क्यों अटकी रही। उन्होंने कहा कि जवाबदेही तय किए बिना ऐसी घटनाओं से सबक लेना मुश्किल है।

टेंडर से काम तक 859 दिन, तब तक लोग दूषित पानी पीते रहे

करीब ढाई करोड़ रुपए के टेंडर की प्रक्रिया में देरी को भी सिंघार ने गंभीर मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव और प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी के कारण जरूरी काम समय पर पूरा नहीं हो सका। आयोग की रिपोर्ट में भी पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया में हुई लंबी देरी को त्रासदी की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण माना गया है। एक परियोजना में टेंडर से काम पूरा होने तक 859 दिन लगने का उल्लेख किया गया है।

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श्रेणियाँ:मध्यप्रदेशइंदौरराजनीतिस्वास्थ्य

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