
नई दिल्ली। त्योहार खुशियां मनाने, परिवार के साथ वक्त बिताने और अपनी जरूरतों के लिए खरीदारी करने का मौका होते हैं, लेकिन जब रोजमर्रा की चीजों के दाम लगातार बढ़ने लगें तो त्योहारों की तैयारी भी बजट का हिसाब-किताब बनकर रह जाती है। खाने-पीने की चीजों, ईंधन और कारखानों में बनने वाले सामान की कीमतों में तेजी के बीच थोक महंगाई दर 11.39 प्रतिशत पर पहुंचने की खबर आम लोगों की चिंता बढ़ाने वाली है। ऐसे में सवाल है कि बढ़ती कीमतों के बीच आम परिवार अपनी जरूरतें कैसे पूरी करेगा और त्योहारों का खर्च कैसे संभालेगा?
थोक महंगाई में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है। अनाज, सब्जियां, फल, दूध और अंडे जैसी जरूरी चीजों की कीमतों में तेजी का दबाव परिवारों के मासिक बजट को प्रभावित करता है। वहीं, ईंधन और बिजली महंगी होने से उत्पादन तथा परिवहन की लागत भी बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर रोजमर्रा के सामान की खुदरा कीमतों पर दिखाई दे सकता है। आम आदमी के लिए मुश्किल यह है कि उसकी आय में बढ़ोतरी की रफ्तार अक्सर खर्चों में होने वाली वृद्धि के बराबर नहीं होती।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, थोक महंगाई दर अगस्त के 9.92 प्रतिशत से बढ़कर 11.39 प्रतिशत हो गई है। इसे 30 महीने का उच्चतम स्तर बताया गया है। सितंबर 2025 में यही दर माइनस 0.2 प्रतिशत थी। हालांकि थोक महंगाई और खुदरा महंगाई अलग-अलग सूचकांक हैं, लेकिन थोक स्तर पर कीमतों में लगातार तेजी बने रहने से उपभोक्ताओं पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। ऐसे में महंगाई के आंकड़ों को केवल आर्थिक रिपोर्ट तक सीमित नहीं रखा जा सकता, क्योंकि उनका संबंध आम आदमी की खरीदने की क्षमता से भी है।
पश्चिम एशिया में युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही बाधित होने से कच्चे तेल और उर्वरकों की कीमतों पर दबाव बढ़ने की बात सामने आ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले बदलावों का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। लेकिन सवाल यह है कि जब वैश्विक परिस्थितियों के कारण लागत बढ़ती है, तब सरकार आम लोगों को राहत देने के लिए क्या कदम उठाती है? क्या जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर निगरानी पर्याप्त है? क्या जमाखोरी और मुनाफाखोरी रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई हो रही है? अंतरराष्ट्रीय संकट अपनी जगह है, लेकिन घरेलू स्तर पर राहत देने की जिम्मेदारी से सरकार बच नहीं सकती।
त्योहारों के दौरान कपड़े, मिठाई, किराना, घरेलू सामान और उपहारों पर खर्च बढ़ जाता है। ऐसे में महंगाई का दबाव परिवारों को गैरजरूरी खर्चों में कटौती करने के लिए मजबूर कर सकता है। मध्यमवर्गीय और कम आय वाले परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीमित आमदनी में घर चलाने के साथ त्योहार की जरूरतें पूरी करना है। यदि जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ती रहती हैं, तो बाजार में मांग और छोटे कारोबारियों की बिक्री पर भी असर पड़ सकता है। त्योहारों की रौनक तभी बनी रह सकती है, जब लोगों के पास खरीदारी के लिए पर्याप्त पैसा बचे।
महंगाई पर नियंत्रण केवल बयान देने या आंकड़े जारी करने से नहीं होगा। इसके लिए जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखना, बाजार में कीमतों की निगरानी करना, जमाखोरी पर कार्रवाई करना और जरूरत पड़ने पर लक्षित राहत के उपाय करना जरूरी है। सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि बढ़ती कीमतों से आम परिवारों को बचाने के लिए कौन-से कदम उठाए जा रहे हैं और उनका लाभ लोगों तक कैसे पहुंचेगा। महंगाई के आंकड़ों के साथ जनता को राहत मिलने के परिणाम भी सामने आने चाहिए।
महंगाई का असली असर सरकारी आंकड़ों से ज्यादा उस परिवार के बजट में दिखाई देता है, जो महीने के अंत तक खर्च चलाने के लिए जरूरी जरूरतों में कटौती करता है। त्योहारों से पहले बढ़ती कीमतें इस चिंता को और गहरा करती हैं। सवाल सीधा है- जब जरूरी सामान महंगा हो रहा है, तो आम आदमी की जेब को राहत देने के लिए ठोस कदम कब उठाए जाएंगे? सरकार के लिए चुनौती केवल महंगाई के कारण बताना नहीं, बल्कि लोगों को यह भरोसा दिलाना भी है कि उनकी रसोई, उनकी बचत और त्योहारों की खुशियां महंगाई की भेंट नहीं चढ़ेंगी।
26 अक्टूबर 2026