सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बरी होने का मतलब रिकॉर्ड साफ होना नहीं

 सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि कर्मचारी यदि संदेह के आधार पर बरी हुआ है तो उसका आपराधिक रिकॉर्ड साफ नहीं माना जा सकता। यह रिकॉर्ड तभी साफ माना जाएगा जब उसके खिलाफ दायर केस झूठा पाया गया हो और वह उसमें छूट गया हो।

स्क्रीनिंग कमेटी ने बंटी को मध्यप्रदेश पुलिस सेवा में भर्ती के लिए इस आधार पर अनुपयुक्त पाया था कि वह नैतिक भ्रष्टाचार के मामले (आईपीसी की धारा 392 और 411) में लिप्त था। हालांकि इस केस में वह छूट गया था।

हाईकोर्ट में चुनौती : कमेटी के निर्णय को बंटी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि बंटी को बरी करने का फैसला रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित था और उसे छोड़ा इसलिए गया कि उसका अपराध संदेह से परे जाकर साबित नहीं हो रहा था। इसलिए उसे नियुक्ति आदेश मिलना चाहिए। राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

गंभीर किस्म का मामला : जस्टिस अरुण मिश्रा और नवीन सिन्हा की पीठ ने इस पर विचार किया और कहा कि आरोपों की प्रकृति को देखते हुए कहा जा सकता है कि आरोपी ने पुलिस अधिकारी बनकर अपराध किया। यह गंभीर किस्म का मामला था जिसमें नैतिक दुराचार शामिल था। पीठ ने कहा कि उसे संदेह का लाभ देने के आधार पर छोड़ देने से उसके आपराधिक पृष्ठभूमि पर बने बादल नहीं छंट जाते। स्क्रीनिंग कमेटी की यह राय, कि उम्म्मीदवार अनुशासित पुलिस फोर्स में आने के लिए अनफिट है, सही है।

कर्मचारी को संदेह का लाभ दिया था
हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए पीठ ने कहा कि आपराधिक मामले में संदेह के आधार पर या अन्य तकनीकी कारणों की वजह से छूट जाने के मामले में यह नियोक्ता पर निर्भर करता है कि वह सभी सुसंगत कारकों पर विचार कर निर्णय ले। और देखे कि क्या उसे सेवा में लिया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में उसके खिलाफ गवाह अदालत में मुकर गए थे। यह साफ बरी होना नहीं था, उसे संदेह का लाभ दिया गया। .

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