लोकसभा चुनाव: 25 साल बाद एक मंच पर होंगे मायावती और मुलायम

सपा-बसपा की दोस्ती के सफर में 19 अप्रैल को बड़ा लम्हा होगा । पच्चीस साल बाद पहली बार मायावती व मुलायम सिंह यादव एक मंच पर होंगे। मायावती मुलायम के लिए वोट मांगेंगी। मैनपुरी की जनता के लिए तो यह ऐतिहासिक पल होगा…और यह सब होगा मुलायम के बेटे व सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की वजह से।

सपा बसपा रालोद की संयुक्त रैलियों का चौथा पड़ाव यादव बहुल मैनपुरी है। 19 अप्रैल को मैनपुरी में अखिलेश यादव, मायावती, मुलायम सिंह यादव व अजित सिंह एक मंच पर होंगे। वहां की जनता के लिए सबसे उत्सुकता तो सपा के मंच पर मायावती की मौजूदगी को लेकर है। देखना है कि मायावती व मुलायम जनता को व एक दूसरे को क्या संदेश देते हैं।

वैसे मुलायम सिंह यादव के लिए मैनपुरी में वोट झूम कर बरसते हैं। वह लंबे वक्त से यहां से चुनाव लड़ और जीत रहे हैं। सपा अकेले लड़ती तो भी मैनपुरी को लेकर चिंतित नहीं रहती है लेकिन अब बसपा की ताकत जुड़ने से गठबंधन खासा मजबूत हो गया है।

बरसों पहले बीच राह में खत्म हो गया था दोस्ती का सफर : बरसों पहले गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा बसपा की राहें जुदा हो गईं थीं। इससे पहले यूपी की जनता ने सपा बसपा या यूं कहें कांशीराम व मुलायम की दोस्ती का भी वक्त देखा है। कैसे इटावा लोकसभा उपचुनाव में मुलायम सिंह यादव ने कांशीराम की जीत सुनिश्चित की थी। कैसे मुलायम सिंह यादव व कांशीराम ने दलित, पिछड़ा व मुस्लिम समीकरण जोड़ कर ऐसा गठबंधन तैयार किया जिसने राम मंदिर आंदोलन के माहौल में भाजपा का विजय रथ सत्ता में आने से रोक दिया और खुद सरकार बना ली। 1993 में कांशीराम व मायावती ने लखनऊ के एतिहासिक बेगमहजरत महल पार्क में संयुक्त रैली की थी। इसमें भारी तादाद में जनता इन नेताओं को सुनने जुटी।

यहीं से दोस्ती और पक्की हुई। पर दोस्ती का यह सफर ज्यादा वक्त नहीं चला। 2 जून 1995 को सपा बसपा की राहें ऐसी जुदा हुईं कि दोनों दलों के बीच वैमनस्यता बढ़ती गईं लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई तो 2012 के चुनाव में सपा ने। दो ताकतवर दल लेकिन अलग अलग। जब 2014 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों को भाजपा की ताकत के आगे काफी कमजोर साबित किया। उन्हें संभलने का मौका मिलता इससे पहले 2017 के चुनाव में सपा बसपा का फिर बुरा हाल हुआ। वक्ती जरूरतों ने व वजूद बचाने के लिए एक साथ आने का साहसिक निर्णय किया और गठबंधन बना कर चुनाव लड़ रहे सपा बसपा ने अपने साथ रालोद को भी ले लिया।

खास बातें
-भाजपा ने यह सीट कभी नहीं जीती जबकि कांग्रेस चार बार जीत चुकी है। .
– खुद मुलायम सिंह यादव यहां से 1996, 2004, 2009  2014 का लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं।
– मुलायम ने यह सीट 2004 जीत कर खाली की थी तो धर्मेंद्र यादव उपचुनाव में जीते। जब 2014 में जीत कर इस्तीफा दिया तो उनके पौत्र तेज प्रताप जीते।
– सपा से अलग होकर अलग पार्टी बनाने वाले शिवपाल यादव भी मैनपुरी में नेताजी को समर्थन कर रहे हैं।
– शिवपाल मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र में आने वाली जसवंत नगर से विधायक हैं।
– मैनपुरी में करीब 38 प्रतिशत यादव के अलावा भारी तादाद में शाक्य वोटर हैं।

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