बीजेपी की नीति: उम्मीदवारों की जगह नरेंद्र मोदी के चेहरे को तवज्जो

लोकसभा चुनावों के दूसरे चरण के चुनाव प्रचार अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अन्य भाजपा नेताओं के चुनाव सभाओं में उमड़ रही भीड़ से भाजपा के चुनाव प्रबंधक खासे उत्साहित हैं। भाजपा के अभियान में अब मोदी व पार्टी के चुनाव निशान की गूंज शुरू हो गई है, जिसमें उम्मीदवार कौन है, उसका महत्व ज्यादा नहीं है।

पार्टी को उम्मीद है कि दूसरे चरण में मतदान बढ़ेगा। हालांकि इस चरण के आखिरी दिन उसके स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ पर तीन दिन के चुनाव प्रचार का प्रतिबंध लगाए जाने से कुछ सभाएं रद्द करनी पड़ी हैं, लेकिन पार्टी के दूसरे नेताओं के प्रचार के कारण ज्यादा असर नहीं पड़ा है। इस दौरान भाजपा ने अपने चुनाव अभियान को एक पायदान उपर चढ़ाते हुए मोदी व पार्टी के निशान पर जोर देना शुरू कर दिया। सभाओं में भीड़ की तरफ से लगने वाले मोदी-मोदी के नारों के बीच उसके नेता जोर दे रहे हैं कि मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को जिताएं। इसमें उम्मीदवार के नाम की ज्यादा चर्चा नहीं हो रही है।

चुनाव को 2014 की पिच पर ले जाने की मुहिम : विपक्षी दलों के सामाजिक समीकरणों वाले राज्यवार गठबंधनों को देखते हुए भाजपा चुनाव को इसी पिच पर ले जाना चाहती है, जहां भाजपा को लेकर जनता में उसके उम्मीदवार से ज्यादा चर्चा मोदी की हो। भाजपा अपनी बड़ी सफलता के लिए 70 फीसद से ज्यादा मतदान की कोशिश कर रही है। पहले व दूसरे चरण के बीच के अभियान में भाजपा ने काफी मेहनत की और उसकी सभाओं में भीड़ भी बढ़ी। भाजपा के एक प्रमुख नेता का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं में वैसी ही भीड़ उमड़ रही है जो 2014 के चुनावों के समय थी।

अमर्यादित बोल बने मुसीबत
इस चरण में एक खास बात चुनाव प्रचार में अमर्यादित भाषा को लेकर चुनाव आयोग का डंडा भी रहा। चार नेताओं पर दो से तीन दिनों तक प्रचार करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। इनमें सपा के आजम खान व बसपा की मायावती के साथ भाजपा के योगी आदित्यनाथ व मेनका गांधी शामिल है। आदित्यनाथ की तीन दिन की कई सभाओं को रद्द करना पड़ा। इसमें दूसरे चरण की सभाएं भी शामिल हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि इस कार्रवाई का सकारात्मक असर पड़ेगा और विपक्ष की अभद्र भाषा कम होगी। भाजपा का कहना है कि वह किसी नेता की अभद्र भाषा का समर्थन नहीं करती है, लेकिन भाजपा नेताओं ने जो कहा वह विपक्ष के नेताओं द्वारा शुरू किए गई भाषा का जबाब था। अगर चुनाव आयोग पहले ही विपक्ष के नेताओं के भाषणों पर संज्ञान ले लेता तो यह स्थिति नहीं आती।

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